
"हिन्दी दिवस पर, हिन्दी बोलने वाले, हिन्दी बोलने वालों से कहते है की हिन्दी बोलना चाहिए।" हरिशंकर परसाई द्वारा लिखा गया यह वाक्य आज हमारे समाज में हिंदी की स्थिति को दर्शाता है।
हिन्दी दिवस की बधाई! परंतु मेरा सवाल ये है की आखिर हिन्दुस्तान में हिंदी दिवस की आवश्यकता क्यूँ? हम इतने सालों से आपस में एक दूसरे को हिन्दी का महत्व क्यों बता रहे है? यह भाषा हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा हैं, यह बात हमें हर साल इस देश को क्यूँ याद दिलानी पड़ती हैं?
हिन्दी सिर्फ हमारी भाषा नहीं हमारी पहचान हैं, हाँ यह कहना भी बिल्कुल गलत नहीं होगा की हिन्दुस्तान सिर्फ हिन्दी नहीं बल्कि अन्य भाषा जैसे की तेलुगु, गुजराती, पंजाबी, बंगाली कुल मिलाकर 22 भाषाओं का मेल है। यह हमारे देश के लिए गर्व की बात हैं की इतने अलग होने के बाद भी हममे समानता हैं, शायद यह भी एक कारण है, हमारे देश की एक अपनी राष्ट्रभाषा नहीं हैं, हमने हर भाषा को समान दर्जा दिया हैं, बस माँग है तो सिर्फ इतना की हमे जोड़ने का काम हिन्दी भाषा का हों।
हिन्दी हमारी संस्कृति, हमरा गौरव है पर फिर भी आज समाज में हिंदी के साथ सौतेला व्यवहार क्यों किया जाता है? अँग्रेजी बोलने वालों को हिन्दी भाषी के अपेक्षा ज्यादा सक्षम माना जाता हैं, यहाँ तक की जिन स्कूलों में आज हिंदी दिवस के दिन हिन्दी की महानता के ऊपर भाषण दिए जायेंगे उन्हीं स्कूलों में अगले दिन से अँग्रेजी में बात करना अनिवार्य कर दिया जाएगा, अँग्रेजी भाषा हमारे उज्जवल भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, पर डर इस बात का है की कहीं हम अंग्रेज़ी को समझते समझते, हमारी संस्कृति हिन्दी से अलग ना हो जाये।
शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा हैं। भारत में अनेक भाषा बोली जाती हैं, हर राज्य की अपनी एक भाषा हैं और वहाँ के लोगों को अपनी मातृभाषा से लगाव हैं। इसीलिए जब बात हिन्दी की आती हैं तब वे लोग अपनी मातृभाषा को अधिक महत्व देते हैं और कभी कभी यह एक विवाद का विषय भी बन जाता हैं। पर हमें यह समझना होगा की जैसे उनकी मातृभाषा उनके राज्य के लिए महत्वपूर्ण हैं वैसे ही हिन्दी हमारे राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण हैं। हिंदी हमारी राष्ट्रीय एकता, साहित्य संस्कृति को दर्शाता हैं। कई लोगों को ऐसा भी लगता है की स्कूलों में, हमारे समाज में खासतौर पर हिन्दी दिवस के दिन हिन्दी भाषा का झूठा महिमामंडन किया जाता हैं क्योंकि स्कूलों में हिंदी सिर्फ एक विषय हैं और उनके अनुसार हमारे लिए सिर्फ एक भाषा और भाषा का अर्थ यह होता हैं की अपने भाव को शब्दों के माध्यम से प्रकट करना जो की हम अन्य किसी भी भाषा से स्पष्ट कर सकते है पर हम यह भूल रहे हैं की हिन्दी सिर्फ एक विषय नहीं सिर्फ एक भाषा नहीं हमारा आत्मगौरव हैं और इसे बढावा देना, इसका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है।
हिन्दी सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के अन्य कई देशों खासतौर पर हमारे पड़ोसी देशों में भी बोली जाती हैं। दुनियाभर के लोग हमारी संस्कृति हमारी भाषा का आदर कर रहे हैं ऐसे में जब हम आपस में ही अपनी भाषा- राष्ट्र भाषा को लेकर विवाद करते हैं तो यह हमारे लिए काफी दुखद बात हैं।

भारत को विभिन्नता और एकता का प्रतीक माना जाता हैं,पर हमारे देश के आदरणीय प्रतिनिधि ही हमारी भाषा- हमारी संस्कृति का मुद्दा उठाकर पूरे विश्व के समक्ष हमारी एकता और हमारे संविधान का मज़ाक बना रहे हैं।
राष्ट्रीय एकता, समरसता, विकास और पहचान के लिए हमें एक राष्ट्रीय भाषा की आवश्कता तो है पर अपने ही लोगों के मध्य विवाद और मतभेद कर अपनी बात मनवाना हमरी संस्कृति के खिलाफ है।
हर एक देश की अपनी एक समान्य भाषा समाजिक एकता और पहचान को बढ़ावा देती है, हमारे देश में जिस तरह से विभिन्न समुदाय और भाषा के लोग साथ रहकर विभिन्नता और एकता का उदाहरण देते है उसी तरह राष्ट्रीय भाषा का होना हमारी अखंडता का उदाहरण देगा। एक सामान्य भाषा के होने से सरकारी और सामाजिक कामों में भी आसानी होगी और विज्ञान- शिक्षा के क्षेत्र में भी सुगमता होगी।
"एक राष्ट्र एक भाषा " का सिद्धांत हमारे समाज के लिए सार्थक और उपयोगी है पर इससे कहीं न कहीं हमारे देश की सबसे बड़ी धरोहर, हमारे विभिन्न भाषा और इनका सौंदर्य कम हो सकता हैं और राज्यों के बीच भाषाई द्वंद्व छिड़ सकता हैं। किसी एक भाषा को अधिक महत्व देने से बाकी के अन्य भाषाओं को क्षति पहुच सकती है। इन्हीं कारणों से हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा नहीं दिया गया और कई आंदोलन भी किए गए जैसे की तमिलनाडु का हिन्दी भाषा विरोधी आंदोलन (1965)।
पहला हिन्दी विरोधी आंदोलन 1937 में सी राजा गोपालचारी के नेतृत्व में हुआ था और यह आंदोलन 3 साल तक चला इसमें कई लोग शामिल थे और कुल मिलाकर 1195 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

भारत की आजादी के बाद साल 1965 में मद्रास के कॉलेज के छात्रों ने बड़े पैमाने में हिंदी विरोध आंदोलन किया जिसमें करीब 50000 छात्र शामिल थे यह आंदोलन धीरे-धीरे हिंसा में बदलते जा रहा था दो सप्ताह के अंदर इस आंदोलन में 70 लोग मारे गए और 10 करोड़ की सम्पत्ति का नुकसान भी हुआ था अंत में सरकार ने अपने कदम पीछे ले लिए।
साल 1986 में भी प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति पेश की थी इसमें नवोदय विद्यालय की स्थापना की बात की गई थी जिसमें गरीब प्रतिभाशाली बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की और इन स्कूलों में हिंदी पढ़ाना अनिवार्य किए जाने की बात की गई थी जिसका विरोध तमिलनाडु ने किया और 21 व्यक्तियों ने आत्मदाह करके आत्महत्या कर ली थी। वर्तमान में तमिलनाडु भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां नवोदय विद्यालय नहीं है।
वर्ष 2014 में भी जब सरकार ने सभी सरकारी कर्मचारियों को सोशल साइट्स पर अधिकारीक खाते बनाने के लिए हिंदी को प्राथमिकता देनी चाहि तब भी तमिलनाडु ने तुरंत इसका विरोध किया।

हिन्दी को लेकर विरोध सालों से चला आ रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 344(1) और 8 वी अनुसूची के अनुसार 22 अधिकारीक भाषाएं हैं जिनमें से सबसे ज्यादा प्रयोग हिन्दी भाषा का किया जाता है ना केवल हमारे देश में ब्लकि अन्य देशों में भी। सरकार ने हिंदी को एकमात्र राष्ट्रभाषा बनाने के कई प्रयास किए पर भारत का एक क्षेत्र हमेशा से इसका विरोध करता आया है इनमें से कौन सही है कौन गलत इसका हम निश्कर्ष नहीं निकाल सकते। हिंदी को हमारी राष्ट्रभाषा बनाने के पीछे का कारण किसी भी प्रकार से दूसरी भाषाओं को क्षति पहुंचाना नहीं था पर अगर इसके कारण हमारा देश भाषा के आधार पर बटने लगे तो इससे हमारी एकता पर कई प्रश्न उठ सकते हैं।
हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं हैं पर फिर भी यह पूरे विश्व में तीसरी सबसे प्रसिद्ध भाषा हैं इसका साहित्य हमारी संस्कृति को दर्शाता है। हिंदी भाषा की सरलता और सहजता ही इसे अन्य भाषाओं से अलग बनाती है। विश्व भर में हिंदी भाषी को मधुर भाषी भी कहा जाता है। आज दुनिया भर के लोग हिन्दी अपनी रुचि से पढ़ रहे हैं और समझ रहे हैं यह बदलाव धीरे धीरे समय के साथ आया है। हमारे साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में मुश्किल से मुश्किल बात इतनी सरलता से लिख दी है, चाहे वह कबीर के दोहे हो या सूरदास के पद तुलसीदास के रामचरितमानस हो या रबीन्द्रनाथ तेगोर की गीतांजलि। हिन्दी का साहित्य सागर से भी गहरा है और आनंदमयी है, यदि हम इसे अपने जीवन में उतार ले हमारे जीवन का उद्धार हो सकता है।
हिन्दी राष्ट्रीय भाषा ना होते हुए भी पूरे विश्व में प्रसिद्ध है, अंततः हिन्दी का महत्व जानने और इसकी लोकप्रियता बढ़ाने के लिये हमें उसे राष्ट्रभाषा बनाने की आवश्यकता नहीं, हिन्दी स्वयं में ही परिपूर्ण हैं।
--कुमारी रिचा