यथा ह्यनास्वादयितुं न शक्यं जिह्वातलस्थं मधु वा विषं वा ।
अर्थस्तथा ह्यर्थचरेण राज्ञः स्वल्पोऽप्यनास्वादयितुं न शक्यः ॥
अर्थात जिस प्रकार जीभ पर पड़े मधु अथवा विष पदार्थ का स्वाद लिये बिना रहना असंभव है, उसी प्रकार कल्याण-कार्य में नियुक्त कर्मी के लिए योजना हेतु प्रदत्त धन के एक अंश का स्वाद लिए बिना रह पाना मुश्किल है ।
उपरोक्त कथन भारतवर्ष के महान राजनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य ने अपने ग्रंथ अर्थशास्त्र में सदियों पहले लिखीं थीं। परंतु सोचने पर आश्चर्य होता है की यह पंक्तियाँ एक्किस्वीं सदी के विश्व-पुरोधा भारत पर भी चरितार्थ बैठती हैं।
आज का भारत तकनीक और उद्यम के शिखर पर है। समय के स्यंदन पर सवार आज का भारत प्रगति की नई परिभाषा लिखा रहा है। प्राचीन आदर्शों व नवीन संकल्पनाओं के साथ बढ़ता हुआ हमारा हिंदुस्तान कदाचित एकमात्र ऐसा देश है जिसने अनेकों संस्कृतियों व सभ्यताओं को समृद्ध करने के साथ साथ मानव जाती की बौधिक मीमांसा में सबसे मौलिक योगदान दिया है।
तो फिर ऐसा क्यों है की आचार्य चाणक्य की सदियों पहले लिखी गयी बातें वर्तमान के सामाजिक परिदृश्य का भी सफल वर्णन करती हैं? आखिर ऐसा क्यों है की देश के विभिन्न आर्थिक वर्गों के बीच इतनी असमानता आ चुकी है? प्राकृतिक संसाधन एवं मानव संपदा में समृद्ध होते हुए भी हमारा विकास इतना विलंबित क्यों है? आज भी पश्चिम देशों की परिभाषा के अनुसार हमारा देश विकसित(यानी डेवलप्ड) होने के बजाए विकासरत(यानी डेवलपिंग) क्यों है?
आखिर क्यों…?
विचार करने पर यह समझने में बहुत ज्यादा समय नही लगेगा कि इन प्रश्नों का जवाब है व्यवस्था में व्याप्त समस्याएं जो राष्ट्र निर्माण में बाधक सिद्ध हो रही हैं। इन समस्याओं का दंश मानो देश के आर्थिक व राजनैतिक आधार को खोखला बनाये जा रही हैं। राजनीतिक पार्टियां वर्गों के बीच की खाई को और गहरा खोद कर सरकारें बन रही हैं। सरकारी योजनाएं तो जन मानस तक पहुँचती नही हैं, नौकरशाही अपना पेट भरने मे ही अधिक तत्पर प्रतीत होती है। हर एक कार्य का "रेट" तय है जिसको चुकाये बिना आपकी फाइल बस मेज़ दर मेज़ घूमती रहती है। बिन पैरवी के आजकल कोई काम निकलवाना या कोई पद प्राप्त करना असंभव है। संस्थानों में पात्रता का मखौल बनाया जा रहा है। और ऐसी व्यवस्था पर उठने वाले किसी प्रकार के सवाल को द्रोह का रूप दे दिया जाता है।
रोवहु सब मिलि, आवहूँ भारत भाई ।
हा! हा! भारत- दुर्दशा न देखी जाई ।।
- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, भारत दुर्दशा
शिक्षा के क्षेत्र में भारत ने बेशक तरक्की की है। शैक्षणिक संस्थान बौद्धिक विकास के आधार स्तंभ माने जाते हैं। मगर फिर भी कई देशों के मुकाबले हमारी साक्षरता बहुत पीछे है। बेशक हमारे पास आज आईआईटी आईआईएम जैसे संस्थान हैं पर ये अदम्यता के महाद्वीप हैं जो दरम्यता के सागर पर तैर रहे हैं। एक औसत संस्थान से निकलने वाले ग्रेजुएट के पास डिग्री तो होती है पर अक्सर कुशलता एवं योग्यता की कमी पायी जाती है। आज का विधार्थी विद्यार्जन के बजाए परीक्षा पास करने के लिए पढ़ता है। दरसल छोटे स्तर पर देखने पर हमारी शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त "मिडियोक्रिटी" का पता चलता है। सरकारी स्कूलों में बच्चे बस मध्याह्न भोजन यानी मिड डे मील के समय आते हैं। मिड डे मील योजना में भी धांधली पकड़ाई जा रही है। योजना के नाम पर आने वाली राशि में कितना गबन होता आ रहा है यह कोई छिपी बात नही है।
चिकित्सा का क्षेत्र भी इस समस्या से अछूता नही है। सरकारी अस्पताल के डॉक्टर रोगियों व परिजनों को अपने निजी क्लिनिक में इलाज करवाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। देश के अधिकांश लोग प्राइवेट अस्पतालों के खर्चों का वहन करने में सक्षम नही हैं। एक लंबा मेडिकल बिल बनाने के लिए तो हर संभव नैतिक अनैतिक रास्तों का सहारा लिया जाता है। मृत्यु के पश्चात भी परिजनों को बिन सूचित किये कई कई दिनों तक शव को आपरेशन कक्ष में रखा जाता। चंद पैसों के लिए इसमे भी गुरेज़ नही किया जाता।
ये तो रही शिक्षा व चिकित्सा की बात, मगर लगभग हर क्षेत्र में मौलिक पतन की समस्या विराजमान है। अगर यूँ कहें की क्रिकेट का खेल भारत देश की लाइफलाइन है तो तनिक भी अतिशयोक्ति नही होगी। भारतीय इस खेल के सबसे बड़े प्रशंसक हैं। मगर उस दिन हर भारतीय का दिल टूटा था जब अपनी प्रिय टीम एवं खिलाडियों का नाम मैच फिक्सिंग मे उजागर हुआ था। उस घटना ने खेल की भावना और नैतिकता पर गहरा कलंक लगाया था। उसके बाद से शायद ही कोई भारतीय इस खेल को पुनः उसी भावना से देखता होगा।
निष्कर्षतः, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, राजनीति, चिकित्सा, आदि क्षेत्रों में हमारा देश बेशक समस्याओं से घिरा हुआ है, मगर फिर भी इन क्षेत्रों में हुए विकास को ख़ारिज नही किया जा सकता। इसमें कोई दो राय नहीं कि मानव संपदा और प्राकृतिक संसाधन के क्षेत्र में हम परिपूर्ण हैं। यह भी कोई नई बात नही है कि हम आज विश्व की सबसे युवा लोक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। हमारा युवा वर्ग ही हमारे देश के उज्जवल भविष्य का आधार है। इसलिए अगर हमें इन समस्याओं का समाधान करना है तो अपनी क्षमता का विकास करना होगा। अपने मानव संसाधन - अपने वर्कफोर्स - को कुशल और मूल्यपरक तरीके से प्रशिक्षित करना होगा। जनमानस में चारित्रिक चेतना का उद्भव ही भारतवर्ष की प्रगति के अविलंबित उड़ान को सुनिश्चित करेगा। तब ही हमारा देश एक्किस्वीं सदी द्वारा भेंट किये जा रहे अंतहीन अवसरों का लाभ उठा पायेगा। तब ही हमारा देश अपनी महत्वाकांक्षाओं का औचित्य सिद्ध कर पायेगा। और तब ही हमारा देश वैश्विक शक्ति बनने की ओर अग्रसर हो पायेगा।
विजय का फिर दिवस आया, अंधेरा दूर भागा है
इसी मधुरात में सो कर हमारा देश जागा है
नया इतिहास लिखेगा हमारा देश तन्मय हो
क्रांति के नये युग में हमारे देश की जय हो
प्रगति के नये युग में भारतवर्ष की जय हो